बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी द्वारा संविधान सभा में संविधान पेश करते वक्त दिये गये व्यक्तव्य के कुछ महत्वपूर्ण अंश
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी द्वारा संविधान सभा में संविधान पेश करते वक्त दिये गये व्यक्तव्य के कुछ महत्वपूर्ण अंश
रायपुर 28 जनवरी 2024–“अध्यक्ष महोदय एवं सदस्यों, मैं संविधान सभा में केवल इस भावना से आया था कि मैं अछूत वर्ग के हितों की रक्षा कर सकूं। मुझे नहीं मालूम था, यहां मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौपी जाएगी। जब मैं संविधान की मसौदा कमेटी में नियुक्त किया गया तो मुझे आश्चर्य हुआ, और मसौदा समिति ने जब मुझे अपना अध्यक्ष चुना, तो मेरे हृदय में धक्का लगा। मैं असमंजस में पड़ गया कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर क्यों डाली जा रही है। फिर मुझे हर्ष भी हुआ कि मुझे अपने देश की सेवा करने का ही अवसर मिल रहा है।
महानुभावों संविधान कितना ही अच्छा हो, यदि उसे पर अमल करने वाले अच्छे ना हो तो उस से जनहित ना होगा, और यदि अमल करने वाले अच्छे हो तो बुरा विधान भी हितकारी हो सकता है। यह नहीं कहा जा सकता कि इस संविधान पर अमल करने वाले कैसे होंगे। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू करके देश स्वतंत्र होगा।
किसी समय यह देश स्वतंत्र था परंतु अपने ही लोगों के विश्वासघात से हम स्वतंत्रता से वंचित हुए। क्या इतिहास अपने को दोहराएगा इस विचार से मेरा मन चिंतित है। क्या भारत की जनता अपने मत, मजहब या स्वार्थ की अपेक्षा देश को अधिक महत्व देगी? मेरी भावना है, अपने रक्त की अंतिम बूंद तक देकर हमें अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए।
यदि हम लोकतंत्र को सुदृढ करना चाहते हैं तो हमें अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्य वैध मार्ग से प्राप्त करने चाहिए। हिंसात्मक और कूटनीतिक उपाय से नहीं।
इस देश में जितनी भक्ति, जितनी वीर पूजा और जितना अंधविश्वास है उतना किसी अन्य देश में नहीं है।
धर्म में भक्ति तथा वीर पूजा मुक्ति का साधन भले ही हो सकती है, परंतु राजनीति में भक्ति तथा वीर पूजा अधोगति में ले जाने वाला अधिनायकवाद हो जाता है।
स्वतंत्रता, समता और बंधुभाव के आधार पर अधिषिठत सामाजिक जीवन ही लोकतंत्र कहलाता है।
स्वतंत्रता, तो हमें मिली, किंतु भारत में समता का अभाव है। यहां के सामाजिक और आर्थिक जीवन में विषमता का बोलबाला है। इस विषमता को हमें शीघ्र ही मिटा देना होगा, अन्यथा बड़े परिश्रम से निर्मित हुआ यह लोकतंत्र का मंदिर मिट्टी में मिल जाएगा। हम एक राष्ट्र है, ऐसा मानना आत्म वंचना है। हजारों जाति में बंटे हुए लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? यह जातियां और वर्ण राष्ट्र विरोधी है। इन बाधाओं पर विजय पाने से ही हम एक राष्ट्र हो सकेंगे।
जिस संविधान में हमने जनता के लिए, जनता का और जनता द्वारा तत्व निहित किये हैं वह दीर्घकाल तक बना रहे। यदि हम ऐसा चाहते हैं तो हमें सामने उपस्थित संकटों को समझने और उन्हें दूर करने में देर नहीं करनी चाहिए। देश की सच्ची सेवा का यही मार्ग है। ”
✍️ *बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी की जय*
जय जोहार जय भारत जय संविधान:- शैलेंद्र नितिन त्रिवेदी




