*कोरोना काल में विधवा हो गई थी बहू का सास-ससुर ने बेटी के रूप में किया कन्यादान*

*छत्तीसगढ़ आजतक, जगदलपुर 8 जुलाई 2025*
जगदलपुर। हिंदू समाज में मान्यता रही है कि बेटी बाबुल की चौखट से विदा होती है, तो उसकी अर्थी ससुराल से निकलती है। भारतीय समाज में पति के स्वर्गवास के बाद पत्नी को जो वैधव्य का जीवन जीन पड़ता है, उसका अहसास सिर्फ उसी को होता है। देवांगन समाज के सीता-श्यामलाल देवांगन ने अपनी विधवा पुत्रवधू गायत्री का पुनर्विवाह करवाकर सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने की दिशा में भगीरथ प्रयास किया है। नगर में उनके इस कदम की सराहना की जा रही है।
देवांगन समाज के वरिष्ठ शासकीय अधिवक्ता सपन देवांगन ने बताया कि श्यामलाल देवांगन के इकलौते पुत्र पारस देवांगन का विवाह रायगढ़ के चुन्नी हरिलाल देवांगन की पुत्री गायत्री के साथ हुआ था। कोरोना काल में पारस की मौत हो गई और गायत्री विधवा हो गई। सीता-श्यामलाल देवांगन जब भी घर में अपने पुत्र की तस्वीर व उसकी विधवा पत्नी को देखते, तो उनकी आंखें भर आती थीं। विधवा गायत्री सास-ससुर की सेवा में लीन थी। उसकी हर संभव कोशिश थी कि सास-ससुर को बेटे के जाने के सदमे से वह उबार ले। गायत्री ने बेटी की तरह दोनों की सेवा की। इस बीच सीता-श्यामलाल देवांगन ने ठान लिया कि पुत्रवधू का जीवन वैधव्य में नष्ट नहीं होने देंगे। उन्होंने बहू को बेटी समझ कन्या-दान का निश्चय किया। उन्होंने उसके लिए रिश्ता तलाशना शुरू किया, समाज के शिक्षित युवक आशीष ने गायत्री का हाथ थामने पर सहमति दी। सामाजिक रीति-रिवाज से उसका विवाह आशीष से कर सास-ससुर ने अश्रुपूरित आंखों से बहू रूपी बेटी का कन्या-दान कर उसे अपनी दहलीज से विदा किया। बहू के विवाह समारोह में देवांगन परिवार ने अपने सगे-संबंधी और समाज के लोगों को आमंत्रित किया। दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देने पहुंचे लोगों से उन्होंने उपहार में केवल एक रुपये ही स्वीकार किया। इस अनुकरणीय पहल की चारों ओर चर्चा के साथ सराहना हो रही है।
*अमित कौशल शर्मा*
*बस्तर संभाग प्रमुख*



