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कोंडागांवछत्तीसगढ़ / मध्यप्रदेश

*गुरुपूर्णिमा पर विशेष-गुरु पूर्णिमा’ किसी एक व्यक्ति के प्रति सम्मान का नहीं, बल्कि संपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा*

गुरु पूर्णिमा विशेष

*देवगुड़ी से विद्यालय तक: आदिवासी समाज में गुरु का बदलता रूप*

डॉ. रुपेंद्र कवि,
मानव वैज्ञानिक व जनजातीय संस्कृति विशेषज्ञ

*छत्तीसगढ़ आजतक, जगदलपुर 9 जुलाई 2025*

हर वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा को श्रद्धा और स्मृति का पर्व ‘गुरु पूर्णिमा’ मनाया जाता है। यह दिन ऋषि वेदव्यास के जन्मदिवस के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने वेदों का संकलन कर ज्ञान की धारा को व्यवस्थित किया। शास्त्रीय भारत में जहाँ गुरु को ज्ञान का भंडार और मोक्ष का पथप्रदर्शक माना गया, वहीं बस्तर जैसे आदिवासी अंचलों में ‘गुरु’ की परिभाषा और रूप दोनों ही विशेष और बहुआयामी रहे हैं।

देवगुड़ी: जहाँ परंपरा स्वयं गुरु बन जाती है
बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा और नारायणपुर जैसे इलाकों में, गांव की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र देवगुड़ी होती है। यह कोई मंदिर नहीं, बल्कि सामुदायिक स्मृति का स्थल होता है, जहाँ प्रकृति, पूर्वजों और लोकदेवताओं की उपासना की जाती है। देवगुड़ी का पुजारी, जिसे स्थान-विशेष में गुनिया, बैगा या पुजार कहा जाता है, गुरु के रूप में समुदाय का मार्गदर्शन करता है—नैतिकता से लेकर कृषि, संकट निवारण से लेकर सामाजिक संतुलन तक।

यहां ‘गुरु पूर्णिमा’ किसी एक व्यक्ति के प्रति सम्मान का नहीं, बल्कि संपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा और सामुदायिक ज्ञान के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है।

अनुभव आधारित गुरु: पढ़ाया नहीं, सिखाया जाता है
आदिवासी समाज में गुरु वह नहीं होता जो मंच से भाषण दे, बल्कि वह होता है जो जीवन जीने की कला सिखाता है। जैसे—

जंगल से कैसे संवाद करें,
जड़ी-बूटियों से कैसे उपचार करें,
ऋतुओं के संकेत कैसे समझें,
और गोत्र व परंपरा की मर्यादा कैसे निभाएं।
यहां गुरु वह है जो अनुभव से शिक्षा देता है—वाणी से नहीं, व्यवहार से।

बदलती पीढ़ी, बदलती परिपाटी

अब जब जनजातीय समाज शिक्षा, इंटरनेट और आधुनिक संस्थानों से जुड़ रहा है, गुरु पूर्णिमा का अर्थ भी धीरे-धीरे रूपांतरित हो रहा है। विद्यालयों में अब इस दिन छात्रों द्वारा शिक्षकों को सम्मान देने की परंपरा बढ़ रही है, ठीक वैसे ही जैसे शहरी क्षेत्रों में होता है।

मगर इसके समानांतर गांवों में आज भी देवगुड़ी पर दीप जलते हैं, सामूहिक पूजा होती है, और बुजुर्गों को प्रणाम कर जीवन की शिक्षा ग्रहण की जाती है। यह दर्शाता है कि नई परिपाटी के साथ पुरानी जड़ें अब भी जीवित हैं।

समायोजन: टकराव नहीं, तालमेल

बस्तर का आदिवासी समाज सदैव से बाहरी प्रभावों को पूरी तरह अस्वीकार नहीं करता, बल्कि उन्हें अपनी परंपरा के साथ समायोजित करता है। गुरु पूर्णिमा भी इसी समायोजन का उदाहरण है, जहाँ शास्त्रीय भारतीय परंपरा और स्थानीय सांस्कृतिक मान्यताएं एक-दूसरे से जुड़ती हैं।

आज यह पर्व न केवल किसी व्यक्ति के प्रति सम्मान है, बल्कि सामूहिक चेतना, ज्ञान और अनुभव की निरंतरता का उत्सव भी है।

निष्कर्ष

जब हम गुरु पूर्णिमा की बात करते हैं, तो हमें इसे केवल ‘गुरु की पूजा’ तक सीमित नहीं करना चाहिए। खासकर आदिवासी समाजों में यह दिन संवेदनाओं, परंपरा, प्रकृति और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का अवसर है। यह हमें यह सिखाता है कि गुरु केवल कोई शिक्षाविद नहीं, बल्कि वह संस्कृति है जो हमें गढ़ती है।
आज जब देशभर में गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है, बस्तर का आदिवासी जन इसे अपनी संस्कृति की आत्मा को प्रणाम कर मनाता है। देवगुड़ी से लेकर विद्यालय तक—गुरु अब भी है, बस उसके रूप बदल गए हैं।

लेखक परिचय:

डॉ. रुपेंद्र कवी, वरिष्ठ मानव वैज्ञानिक, पिछले दो दशकों से बस्तर(छत्तीसगढ़ )और भारत की जनजातीय संस्कृतियों पर अध्ययन कर रहे हैं। आप जनजातीय अनुभव, परंपरागत ज्ञान, और सांस्कृतिक संरक्षण विषय पर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हैं।

*जय प्रकाश सिंह*
*सिटी ब्यूरो जगदलपुर*

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