700 वर्ष पुराने ऐतिहासिक कोण्डागाँव पारम्परिक मेला का हुआ आगाज।
हिन्दू पंचाग और चंद्र स्थिति के कारण माघ शुक्ल पक्ष में ही प्रथम मंगलवार को मेला आयोजन किया जाता है।
पारम्परिक मेला वर्ष भर में एक बार मनाये जाने वाला एक सामूहिक उत्सव का स्वरूप है।
मेला को लेकर प्रशासनिक व पुलिस व्यवस्था रहती है,चाकचौबंद
बंजारा जाति के लोग वर्तमान में स्थित राम मंदिर के समीप तालाब खुदाई में आये थे,उन्हें खुदाई में माता रूपी दो मूर्तियां मिली।
मिली मूर्तियों को ग्रामीणों की सहमति से स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाने लगी।
मिली उन दो मूर्तियों में से एक मूर्ति गपागोसीन तथा दूसरी मूर्ति को ढाबागोसीन माता के नाम से जाना जाने लगा।
जगदलपुर से लगा उड़ीसा प्रांत स्थित एक छोटा सा गांव भैंसाबेड़ा है, उस गांव के बाघवंश (पटेल) परिवार के द्वारा सेवा पूजा की परंपरा आज भी बनी हुई है।
कोंडागांव 19 मार्च 2024--कोण्डागांव का पारम्परिक मेला वर्ष भर में एक बार मनाये जाने वाला एक सामूहिक उत्सव का स्वरूप है। जिसे प्रत्येक गांव के अपने-अपने ईष्ट देवी-देवताओं का समागम का वृहत सम्मेलन कहा जा सकता है। इस मेले का इतिहास बड़े बुर्जुगों के अनुसार तकरीबन 700 साल पुराना है। यहां बंजारा जाति के लोग वर्तमान में राम मंदिर के पास जो तालाब है उसकी खुदाई के लिए आये हुए थे जिनका डेरा-बसेरा वर्तमान में स्थित शीतला मंदिर के पास था। किसी कारण से तालाब की खुदाई को अचानक अधूरा छोड़कर वे लोग अन्यत्र चले गये तथा खुदाई का सारा सामान भी वहीं छोड़ गये।
गांव के बुजुर्गों को जब पता चला की बंजारा जाति के लोग अचानक कहीं चले गये हैं और उनका सामान भी यहीं पड़ा हुआ है, उस बिखरे हुए सामानों में अचानक एक व्यक्ति की नजर पड़ती है जिसमें माता रूपी दो मूर्तियां दिखाई देती है। उसकी चर्चा वहां उपस्थित समस्त लोगों के साथ देखने पर उस गांव के कोटवार, ग्राम पटेल, माटी पुजारी, देहारी, सिरहा एवं गायता सहित समस्त ग्रामवासियों की सहमति से उसकी स्थापना की जाती है तब उस समय कोण्डागांव का नाम कोंडानार था।
उन दो मूर्तियों में से एक मूर्ति गपागोसीन तथा दूसरी मूर्ति ढाबागोसीन माता के नाम से जाना जाने लगा। इसके पीछे कहानी कुछ इस तरह से है – जो कोई व्यक्ति ग्राम प्रमुख अङ्कारी (ग्राम पटेल) नियुक्त होता था उसे एक लकड़ी का फारानुमा चिरान पूजा सामग्री के रूप में चढ़ाना होता था। उसे देख अन्य व्यक्ति घनघोर जंगल में शिकार के लिए जाने के पूर्व स्थापित देवी के पास मनौती के रूप में फारा चढ़ाऊंगा कहकर जंगल जाकर शिकार में कामयाब होते थे। वही फारा चढ़ाते थे। इस तरह वहां उस देवी के आस-पास लकड़ी के फारा का परत दर परत जैसा हो गया जिसे स्थानीय बोली में ढाबा कहते हैं इस कारण उस माता का नाम ढाबागोसीन पड़ा। दूसरी माता का नाम चुंकि बंजारा जाति के लोग द्वारा छोड़ा गया था इसलिए उस देवी का नाम बंजारिन माता नाम पड़ा।
पूर्व में माता की सेवा सिरहा, पुजारी, केंवट जाति के लोग ही करते थे, लोगों की कमी की वजह से स्वयं भाता सिरहा द्वारा सेवा पूजा किया जाता रहा है। माता के सिर (शक्ति का शरीर में प्रवेश होने वाले को सिर चढ़ना कहते हैं।) बाद में बताया कि मेरी सेवा के लिए जगदलपुर से लगा उड़ीसा प्रांत स्थित एक छोटा सा गांव भैंसाबेड़ा है, उस गांव के बाघवंश (पटेल) के परिवार की मेरी सेवा पूजा आदि तैयार करवाने के लिए यहां लेकर आओ। उस समय से अब तक बाघवंशी के परिवार द्वारा पुजारी नियुक्त किया जाता है।
कोण्डागांव का साप्ताहिक बाजार पूर्व में मंगलवार को ही लगता था जिसे ग्राम देवी माता की सेवा मंगलवार दिन होने के कारण बाजार लगाया जाता था। उसी रात्रि में निशा जतरा भी होता था। इस कारण मंगलवार का बाजार निश्चित किया गया था किन्तु बाद में जनपद फिर तहसील बना जिससे शासन के अधिकारी, कर्मचारी आकर बसते गये तथा कुछ व्यवसायियों की बसाहट हुई। सप्ताह की शुरूआत और शासन का कामकाज चुंकि सोमवार से शुरू होकर शनिवार तक लगातार चलता था और रविवार के दिन शासन द्वारा अवकाश घोषित करने की स्थिति में साप्ताहिक बाजार को रविवार के दिन रखने का निर्णय ग्राम प्रमुख द्वारा निर्णय लेकर मंगलवार दिन को निरस्त किया गया तब से आज तक की स्थिति में यहां का बाजार रविवार को ही लगता आ रहा है।
हिन्दू पंचाग और चंद्र स्थिति के कारण माघ शुक्ल पक्ष में ही प्रथम मंगलवार को ही मेला आयोजन किया जाता है। इसके लिए ग्राम प्रमुख बुजुर्ग मंदिर समिति के पदाधिकारी, अधिकारीगण, तहसीलदार आदि से एक बैठक आयोजित कर पूर्व में माता पहुंचानी कर मेला आयोजन का निर्णय लिया जाता है। बैठक में माता पुजारी एवं गायता के यहां समस्त ग्रामवासी माता का छतर, डंगई लॉट, बैरक आदि सहित उपस्थित होकर बड़े माटी, डोकरा सियानदेव, सोनकुंवर देव, देसमातरा, डोकरा देव आदि देवी देवताओं के लिए आह्वान करने माता के सिरहा, ग्राम पटेल, कोटवार, देहारी, पुजारी, गायता आदि एकत्रित होकर देवगुड़ी में पूजा किया जाता है और मन्नत मांगी जाती है कि आगामी वर्षों तक किसी भी प्रकार का रोग दोष गांव में न हो, सुख समृध्दि रहे। अन्न धन की वृध्दि हो इन कामनाओं के साथ पूजा अर्चना किया जाता है और मेला आयोजन करने की अनुमति ली जाती है। उक्त तिथि के अनुसार ग्रामवासी अपने-अपने ईष्ट देवी देवताओं का जतरा का आयोजन वर्ग अनुसार करते हैं जिसमें गाण्डा जाति, पटेल जाति, देवांगन जाति, कलार जाति, निषाद जाति एवं आदिवासी समुदायों के द्वारा पृथक-पृथक रूप से जतरा किया जाता है।
आज के आधुनिक युग में इस पूरी प्रक्रिया पर कोई परिवर्तन नहीं हुआ है अपितु प्रशासनिक तंत्र एवं प्रचार-प्रसार के लिए आधुनिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाकर सूचना संबंधितों को दिया जाता है। पूर्व में मेला 24 परगना के देवी देवताओं का आगमन से होता था, अभी तहसील, विकासखण्ड, जिला आदि विभाजन के पश्चात् कुछेक परगनाओं से देवी देवता मेला में सम्मिलित होते हैं। स्वरूप वही है किन्तु परम्परा आज भी यथावत् बना हुआ है।
परगना में सबसे प्रमुख परगना का नाम सोनाबाल के नाम से जाना जाता है। मेला के दिन मंगलवार के एक दिन पूर्व अर्थात् सोमवार को रात्रि में बाजार स्थल पर चौरासी समिया देव लाठ द्वारा परिक्रमा किया जाता है तथा रात में ही मेला परिसर में स्थित दंतेश्वरी मावली मंदिर में पूजा अर्चना किया जाता है जिसे निशा जतरा कहते हैं। विभिन्न गांव से आये ग्रामवासी, सिरहा, गायता, पुजारी, मांझी, मुखिया आदि एकत्रित होकर मंदिर के पुजारी से विशेश अनुमति लेकर जतरा सम्पन्न किया जाता है। पूर्व में यह तीन परिक्रमा के द्वारा पूर्ण होती थी अब इसका स्वरूप में थोड़ा सा बदलाव दिखता है। मेला के दिन सर्वप्रथम ग्राम पलारी की पुरला देवी माता के द्वारा कोण्डागांव पहुंचने पर यहां के मंदिर समिति के पदाधिकारियों द्वारा स्वागत कर उन्हें फूल डोबला (फूल दोना) का आदान-प्रदान कर विधिवत् भेंट कर स्वागत करते हुए मेला परिसर तक आने का आग्रह किया जाता है। इस देवी के आगमन के बाद ही मेला परिक्रमा का कार्यक्रम प्रारंभ होता है। मुख्य देवी-देवताओं का समागम होने के कारण इसे मेला का रूप दिया गया है।
जो एक सामाजिक, सांस्कृतिक के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व भी है। इस अंचल में और भी अनेकों प्रकार के उत्सव होते हैं जिसमें इन सभी देवी देवताओं के आव्हान के पश्चात् ही कार्यक्रम को सम्पन्न करने की एक परम्परा चली आ रही है। यह पूर्ण रूप से पारम्परिक उत्सव है जिसे हम मेला का नाम देते हैं।
सौजन्य :- श्री डिबूश्वर कौशिक, श्री सुकालू राम कोर्राम कोटवार, श्री गोपाल कौशिक, श्री नरपति पटेल एवं ग्राम देवी शीतला मंदिर समिति के सदस्य कोण्डागांव ।
प्रस्तुतकर्ता :- श्री खेम वैश्णव, लोक चित्रकार कोण्डागांव ।
पत्रकार साथियों को इस ऐतिहासिक मेला को कवरेज करने का साल भर से रहती प्रतीक्षा
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