*छत्तीसगढ़ आजतक, कोंडागांव 11 मार्च 2026*
साल 2023 में ऐराबोर के बालिका आवासीय पोटाकेबिन में पहली कक्षा की छात्रा के साथ दुष्कर्म की घटना सामने आई थी। 22 जुलाई को हुई यह घटना 24 जुलाई को सार्वजनिक हुई और पूरे सुकमा जिले को झकझोर कर रख दिया। उस समय प्रदेश में भूपेश बघेल की सरकार थी और विधानसभा चुनाव सिर पर थे। घटना ने तुरंत राजनीतिक रूप ले लिया।
विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी ने इस मामले को लेकर आक्रामक आंदोलन खड़ा किया। मूसलाधार बारिश के बीच पोटाकेबिन का घेराव हुआ, कलेक्टोरेट का घेराव हुआ और जिला बंद तक कराया गया। रोजाना हो रहे प्रदर्शनों से जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन पर जबरदस्त दबाव बना। आरोपियों की गिरफ्तारी और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग को लेकर विपक्ष सड़कों पर था। आखिरकार पुलिस ने कथित आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेजा और प्रशासन ने जिम्मेदारी तय करते हुए कोंटा के तत्कालीन बीईओ एसके दीप और बीआरसी को पद से हटा दिया।
लेकिन राजनीति का चरित्र अक्सर घटनाओं से नहीं, अवसरों से तय होता है। आज वही जिला एक अजीब विडंबना देख रहा है। जिन नेताओं ने उस समय बीईओ और अन्य अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग करते हुए सरकार को घेरा था, आज वही नेता एसके दीप की दोबारा बीईओ नियुक्ति पर बधाई संदेश जारी कर रहे हैं। यह नियुक्ति भले ही अदालत के आदेश और वरिष्ठता के आधार पर हुई हो, लेकिन सवाल सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया का नहीं, बल्कि राजनीतिक नैतिकता का भी है।
यह वही अधिकारी हैं जिन्हें उस समय आवासीय पोटाकेबिन में हुई कथित दुष्कर्म घटना में लापरवाही के आरोपों के कारण हटाया गया था। आज जब वही व्यक्ति फिर से उसी जिम्मेदारी के साथ लौटता है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि उस पूरे घटनाक्रम की स्मृति पर भी सवाल खड़ा करता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या उस समय का आक्रोश केवल सत्ता परिवर्तन का औजार था? यदि उस समय की मांगें सच में पीड़िता के न्याय और व्यवस्था की जवाबदेही के लिए थीं, तो आज वही लोग इस नियुक्ति पर चुप क्यों हैं—या फिर बधाई क्यों दे रहे हैं?
राजनीति का सबसे कड़वा सच यही है कि इसमें कई बार शर्म नहीं, केवल लाभ-हानि का गणित चलता है। मुद्दे तब तक जीवित रहते हैं, जब तक वे राजनीतिक लाभ देते हैं। जैसे ही समीकरण बदलते हैं, वही मुद्दे इतिहास की फाइलों में दबा दिए जाते हैं।
एर्राबोर की वह घटना केवल एक अपराध नहीं थी; वह प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक नैतिकता की परीक्षा भी थी। लेकिन आज जो दृश्य सामने है, वह बताता है कि इस परीक्षा में सबसे ज्यादा कमजोर वही निकले, जो उस समय सबसे ऊंची आवाज में न्याय की बात कर रहे थे।
जब राजनीति बेशर्मी की सीमा पार कर जाती है, तब मुद्दे नहीं, स्वार्थ दिशा तय करते हैं। और यही वह क्षण होता है, जब जनता को समझ आ जाता है कि उसके दर्द और आक्रोश को कई बार केवल राजनीतिक मंच के संवाद की तरह इस्तेमाल किया गया था।